Kharif Crops - ख़रीफ़ की फ़सल (Kharif Ki Fasal) in Hindi

ख़रीफ़ की फ़सल : इन फसलों को बोते समय अधिक तापमान एवं आर्द्रता तथा पकते समय शुष्क वातावरण की आवश्यकता होती है। उत्तर भारत में इनको जून-जुलाई में बोते हैं और इन्हें अक्टूबर के आसपास काटा जाता है। अरबी भाषा में 'ख़रीफ़' शब्द का मतलब 'पतझड़' है। ख़रीफ़ की फ़सल अक्टूबर में पतझड़ के मौसम में तैयार होती है इसलिए इसे इस नाम से बुलाया जाता है।
Kharif Ki Fasal

खरीफ की फसलों के उदाहरण

धान (चावल), मक्का, ज्वार, बाजरा, मूँग, मूँगफली, गन्ना, सोयाबीन, उडद, तुअर, कुल्थी, जूट, सन, कपास आदि।

1. धान या चावल

धान (Paddy / ओराय्ज़ा सैटिवा) एक प्रमुख फसल है जिससे चावल निकाला जाता है। यह भारत सहित एशिया एवं विश्व के बहुत से देशों का मुख्य भोजन है। विश्व में मक्का के बाद धान ही सबसे अधिक उत्पन्न होने वाला अनाज है।

ओराय्ज़ा सैटिवा (जिसका प्रचलित नाम 'एशियाई धान' है) एक पादप की जाति है। इसका सबसे छोटा जीनोम होता है (मात्र 430 एम.बी.) जो केवल 12 क्रोमोज़ोम में सीमित होता है। इसे सरलता से जेनेटिकली अंतरण करने लायक होने की क्षमता हेतु जाना जाता है। यह अनाज जीव-विज्ञान में एक मॉडल जीव माना जाता है।

धान के बीज को चावल कहते हैं। यह धान से ऊपर का छिलका हटाने से प्राप्त होता है। चावल सम्पूर्ण पूर्वी जगत में प्रमुख रूप से खाए जाने वाला अनाज है। भारत में भात, खिचड़ी सहित काफी सारे पकवान बनते हैं। चावल का चलन दक्षिण भारत और पूर्वी-दक्षिणी भारत में उत्तर भारत से अधिक है।

इसे संस्कृत में 'तण्डुल' कहा जाता है और तमिल में 'अरिसि' कहा जाता है।

इसे कभी-कभार 'षड्रस' भी कहा जाता है, क्योंकि में स्वाद के छहों प्रमुख रस मौजूद हैं। सांस्कृतिक हिंदी में पके हुए चावल को 'भात' कहा जाता है, किन्तु अधिकतर हिन्दी भाषी 'भात' शब्द का प्रयोग कम ही करते हैं। चावल की फ़सल को धान कहते हैं। बासमती चावल भारत का प्रसिद्ध चावल है जो विदेशों को निर्यात भी किया जाता है।

2. मक्का

खरीफ फसलों में धान के बाद मक्का प्रदेश की मुख्य फसल है। इसकी खेती, दाने /भुट्टे एवं हरे चारे के लिए की जाती है। मक्का की अच्छी उपज के लिए आवश्यक है कि समय से बुवाई, निकाई-गुड़ाई खरपतवार नियंत्रण, उर्वरकों की संतुलित प्रयोग, समय से सिंचाई एवं कृषि रक्षा साधनों को अपनाया जाय। संस्तुत सघन पद्धतियां अपनाकर संकर/संकुल प्रजातियों की उपज सरलता से 35-40 कु. प्रति हे० प्राप्त की जा सकती है। साथ ही अल्प अवधि की फसल होने के कारण बहु फसली खेती के लिए इसका अत्यन्त महत्व है।

3. ज्वार

ज्वार की खेती मुख्यतः प्रदेश के झांसी, हमीरपुर, जालौन, बांदा, फतेहपुर, इलाहाबाद, फर्रूखाबाद, मथुरा एवं हरदोई जनपदों में होती है। अच्छी उपज प्राप्त करने हेतु उन्नतिशील प्रजातियों का शुद्ध बीज ही बोना चाहिए। बुवाई के समय क्षेत्र अनुकूलता के अनुसार प्रजाति का चयन करें। बलुई दोमट अथवा ऐसी भूमि जहां जल निकास की अच्छी व्यवस्था हो, ज्वार की खेती के लिए उपयुक्त होती हैं। बुन्देलखण्ड क्षेत्र में ज्वार की खेती प्रायः मध्यम भारी एवं ढालू भूमि में की जाती हैं।

4. बाजरा

उत्तर प्रदेश में क्षेत्रफल की दृष्टि से बाजरा का स्थान गेहूं धान और मक्का के बाद आता है। कम वर्षा वाले स्थानों के लिए यह एक अच्छी फसल हैं। 40 से 50 सेमी० वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। बाजरा की खेती मुख्यतः आगरा, बरेली एवं कानपुर मण्डलों मे होती है। अच्छी उपज प्राप्त करने हेतु उन्नतिशील प्रजातियों का शुद्ध बीज ही बोना चाहिए। बुवाई के समय एवं क्षेत्र अनुकूलता के अनुसार प्रजाति का चयन करें। बाजरा के लिए हल्की या दोमट बलुई मिट्टी उपयुक्त होती है।

5. मूँग

खरीफ में मूंग की बुवाई सामान्यतः प्रदेश के सभी जनपदों में की जाती है किन्तु इसका सबसे अधिक क्षेत्र झांसी, फतेहपुर, वाराणसी, उन्नाव, रायबरेली तथा प्रतापगढ़ जनपदों में हैं। मूंग में खरीफ के मौसम में पीली मोजैक रोग का अधिक प्रकोप होने के कारण इसकी औसत उपज बहुत कम प्राप्त होती है। इसी बात को ध्यान में रखकर मूंग की खेती को जायद में करने पर बल दिया गया है।

6. मूँगफली

मूंगफली खरीफ की मुख्य तिलहनी फसल है। यह वायु और वर्षा द्वारा भूमि को कटने से बचाती है। मूंगफली के दाने में 22-28 प्रतिशत, प्रोटीन 10-12 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट व 48-50 प्रतिशत वसा पाई जाती है। 100 सेमी० वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में मूंगफली की पैदावार अच्छी होती है। यह मुख्यतः झांसी, हरदोई, सीतापुर, खीरी, उन्नाव, बहराइच, बरेली, बदायूं, एटा, फर्रुखाबाद, मुरादाबाद एवं सहारनपुर जनपदों में अधिक क्षेत्रफल में उगाई जाती है।

7. गन्ना

गन्ना (Sugarcane) भारत की एक प्रमुख नकदी फसल है, जिससे चीनी, गुड़, शराब आदि का निर्माण होता हैं। गन्ने का उत्पादन सबसे ज्यादा ब्राज़ील में होता है और भारत का गन्ने की उत्पादकता में संपूर्ण विश्व में दूसरा स्थान है।

8. सोयाबीन

सोयाबीन की खेती मैदानी क्षेत्र इसकी खेती अभी हाल के वर्षो में शुरू हुई है। इसमें 40-45 प्रतिशत प्रोटीन तथा 20-22 प्रतिशत तक तेल की मात्रा उपलब्ध है। इसके प्रयोग से शरीर को प्रचुर मात्रा में प्रोटीन मिलती है। प्रदेश में बुन्देलखण्ड के सभी जनपदों एवं बदायूँ, शाहजहांपुर, रामपुर, बरेली, मेरठ आदि में की जाती है। निम्न सघन पद्धतियाँ अपनाकर सोयाबीन की खेती अधिक लाभप्रद हो सकती है।

9. उडद या उर्द

उर्द की खेती सामान्यतः प्रदेश के सभी जनपदों में की जाती है लेकिन लखनऊ, फैजाबाद, झांसी, चित्रकूट कानपुर एवं बरेली मण्डलों में इसकी खेती अधिक क्षेत्रफल में की जाती है। समुचित जल निकास वाली बलुई दोमट भूमि इसकी खेती के लिए उपयुक्त है। खेत की प्रथम जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा दो तीन जुताई देशी हल से करके पाटा लगाना चाहिए। शीघ्र पकने वाली प्रजातियों की बुवाई जुलाई के तीसरे सप्ताह से अगस्त के प्रथम सप्ताह तक करनी चाहिए। शीघ्र पकने वाली प्रजातियों को जायद में भी बोया जाता है।

10. अरहर

दलहनी फसलों में हमारे प्रदेश में चने के बाद अरहर का स्थान है यह फसल अकेली तथा दूसरी फसलों के साथ भी बोई जाती है। ज्वार , बाजरा, उर्द और कपास, अरहर के साथ बोई जाने वाली प्रमुख फसलें हैं। हमारे प्रदेश की उत्पादकता अखिल भारतीय औसत से ज्यादा है। सघन पद्धतियों को अपनाकर इसे और बढ़ाया जा सकता है। अरहर की फसल के लिए बलुई दोमट वा दोमट भूमि अच्छी होती है। उचित जल निकास तथा हल्के ढालू खेत अरहर के लिए सर्वोत्तम होते हैं। लवणीय तथा क्षारीय भूमि में इसकी खेती सफलतापूर्वक नहीं की जा सकती है।

11. कुल्थी या कुलथी

कुलथी तीन पत्तियों वाला पौधा है। जिसे सामान्यतः कुर्थी भी कहा जाता है। इसके बीजों में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक होती है। इसका उपयोग औषधि के रूप में होता है। इसके बीज पशुओं को खिलाने के काम आते हैं। दक्षिण भारत में इसके अंकुरित दाने तथा इसके पकवान बनाए जाते हैं।

12. अण्डी या अरंड

अण्डी की खेती तराई क्षेत्र के पीलीभीत, खीरी, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, संत कबीरनगर, गोण्डा, गारेखपुर जनपदों व बुन्देलखण्ड क्षेत्र तथा कानपुर, इलाहाबाद एवं आगरा जनपदों में शुद्ध तथा मिश्रित रूप में की जाती है। इसकी खेती मक्का और ज्वार के साथ तथा खेत की मेड़ों पर की जाती है। इसका तेल दवाओं तथा कल पुर्जो में प्रयोग होता है और विदेशी मुद्रा अर्जित करने का अच्छा साधन है।

13. सन

सनई (सन) की खेती का भारत की कुटीर उद्योग धन्धों एवं अर्थ व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण स्थान है। कुल सनई का लगभग 40 प्रतिशत क्षेत्र उत्तर प्रदेश में है। प्रतागढ़, जौनपुर, आजमगढ़, सुल्तानपुर, सोनभद्र, मिर्जापुर, गाजीपुर, वाराणसी, बांदा व इलाहाबाद में सनई की अच्छी खेती होती है। सनई की खेती के लिए गर्म नम जलवायु उपयुक्त होती है। फसल उत्पादन समय काल में 40-45 सेमी० वर्षा अच्छी मानी जाती है। बलुई दोमट व दोमट सनई की फसल के लिए उपयुक्त होती है।

14. कपास

कपास एक नकदी फसल हैं।यह मालवेसी कुल का सदस्य है।संसार में इसकी 2 किस्म पाई जाती है। प्रथम को देशी कपास (गासिपियाम अर्बोरियाम)एवं (गा; हरबेरियम) के नाम से जाना तथा दूसरे को अमेरिकन कपास (गा, हिर्सूटम)एवम् (बरवेडेंस)के नाम से जाता है। इससे रुई तैयार की जाती हैं, जिसे सफेद सोना कहा जाता हैं | कपास के पौधे बहुवर्षीय ,झड़ीनुमा वृक्ष जैसे होते है।जिनकी लंबाई 2-7 फीट होती है। पुष्प, सफेद अथवा हल्के पीले रंग के होते है।कपास के फल बाल्स (balls) कहलाते है,जो चिकने व हरे पीले रंग के होते हैं इनके ऊपर ब्रैक्टियोल्स कांटो जैसी रचना होती है।फल के अन्दर बीज व कपास होती है। कपास की फसल उत्पादन के लिये काली मिट्टी की आवश्यकता पड़ती है।भारत में सबसे ज्यादा कपास उत्पादन गुजरात में होता है।

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