Zaid Crops - ज़ायद की फ़सल (Jayad Ki Fasal or Jayad Crops) in Hindi

ज़ायद की फ़सल : इस वर्ग की फसलों में तेज गर्मी और शुष्क हवाएँ सहन करने की अच्छी क्षमता होती हैं। ज़ायद की फ़सल सामान्यत: उत्तर भारत में मार्च-अप्रैल में बोई जाती है। इस वर्ग की फसलों में तेज गर्मी और शुष्क हवाएँ सहन करने की अच्छी क्षमता होती हैं। उदाहरण के तौर पर तरबूज़, खीरा, ककड़ी आदि की फ़सलें ज़ायद की फ़सल मानी जाती हैं।
Jayad Ki Fasal

ज़ायद की फसलों के उदाहरण

(a) जायद खरीफ

बीज लगाने का समय: अगस्त से सितम्बर, फसलों की कटाई का समय: दिसंबर से जनवरी, प्रमुख फसलें: धान, ज्वार, रेप्सीड, कपास, तिलहन, आदि।

(b) जायद रबी

बीज लगाने का समयः फरवरी से मार्च, फसलों की कटाई का समयः अप्रैल से मई, प्रमुख फसलें: खरबूजा, तरबूज, ककड़ी, मूंग, लोबीया, पत्तेदार सब्जियां, आदि।

1. धान

जायद में धान की खेती: प्रदेश में खाद्यान की निरन्तर बढ़ती मांग, सिंचाई के साधनों में उत्तरोत्तर वृद्धि तथा रबी की फसल की मड़ाई के लिए आधुनिक यन्त्रों की उपलब्धता से ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो गयी है कि रबी की फसल के कटने तथा खरीफ की फसल की बुवाई के आरम्भ होने के बीच के समय अर्थात् जायद में भी कुछ खाद्यान उगाये जायें। परिणामस्वरूप चेना, सांवा, मूंग, उर्द एवं मक्का की खेती की सम्भावनायें जायद में पर्याप्त हैं, जायद में धान के प्रयोगों से यह विदित हुआ है कि जायद में धान की खेती निचले एवं जलभराव वाले क्षेत्रों में ही किया जाना उचित होगा।

वैसे तो दक्षिणी भारत के प्रान्तों में रबी एवं जायद में धान की खेती सफलतापूर्वक जी जा रही है लेकिन अपने प्रदेश तथा उत्तरी भारत के अन्य प्रदेशों में तापक्रम बहुत कम (ठंड) के कारण जायद में धान की खेती की कुछ कठिनाइयां हैं। अतः जायद में इसकी खेती के लिए इसकी बुवाई की विधि एवं समय पर विशेष सावधानी बरतनी पड़ती है।

2. बाजरा

जायद में बाजरा की खेती: खरीफ के अलावा जायद में भी बाजरा की खेती सफलतापूर्व की जाने लगी है, क्योंकि जायद में बाजरा के लिए अनुकूल वातावरण जहॉ इसके दाने के रूप में उगाने के लिए प्रोत्साहित करता है वहीं चारे के लिए भी इसकी खेती की जा रही है। सिंचाई की जल की समुचित व्यवस्था होने पर आलू, सरसों, चना, मटर के बाद बाजरा की खेती से अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है।

बलुई दोमट या दोमट भूमि बाजरा के लिए अच्छी रहती है। भली भॉति समतल व जीवांश वाली भूमि में बाजरा की खेती करने से अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। पलेवा करने के बाद मिट्टी पलटने वाले हल से 10–12 सेमी. गहरी एक जुताई तथा उसके बाद कल्टीवेटर या देशी हल से दो–तीन जुताइयॉ करके पाटा लगाकर खेत की तैयारी कर लेनी चाहिए। बाजरा की बेवाई मार्च के प्रथम सप्ताह से अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक की जा सकती है। बाजरा एक परागित फसल है तथा इसके परागकण 46 डिग्री.C तापमान पर भी जीवित रह सकते है व बीज बनाते हैं। दाने के लिए 4-5 किलोग्राम प्रति हे. पर्याप्त होता है बीज को 2.5 ग्राम थीरम या 2.0 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किग्रा. की दर से शोधित कर लेना चाहिए।

यह एक शीघ्रता से बढने वाली रोग निरोधक तथा अधिक कल्ले फूटने वाली चारे की फसल है। शुष्क एंव अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में इसकी बुवाई की जाती है। यह अकेले अथवा लोबिया के साथ बोई जाती हे।

3. जूट

जूट की खेती हेतु गर्म तथा नम जलवायु की आवश्यकता होती है। 100 से 200 से०मी० वर्षा तथा 24 से 35 डिग्री सेंटीग्रेड तापक्रम उपयुक्त है। जूट के रेशे से ब्रिग बैग्स कनवास टिवस्ट एवं यार्न के अलावा कम्बल दरी कालीन ब्रुश एवं रस्सियां आदि तैयार की जाती हैं। जूट के डंठल से चारकोल एवं गन पाउडर बनाया जाता है। इसकी बुवाई फरवरी से मार्च में की जाती है।

सीड ड्रिल से पंक्तियों में बुवाई करने पर कैपसुलेरिस प्रजातियों के लिए 4-5 किग्रा० तथा ओलिटेरियस के लिए 3-5 किग्रा० बीज प्रति हे० पर्याप्त होता है। छिड़कवां बोने पर 5-6 किग्रा० बीज की आवश्यकता होती है।

4. कपास

जायद में कपास की खेती: कपास एक महत्वपूर्ण नकदी फसल है। व्यावसायिक जगत में यह ‘श्वेत स्वर्ण’ के नाम से जानी जाती है। प्रदेश में कपास के अंतर्गत 5 लाख हे० क्षेत्रफल था जो घटकर 14 हजार हे० रह गया है। प्रदेश को लगभग 5 लाख रूई की गांठों की प्रतिवर्ष आवश्यकता है। प्रदेश में व्यापक स्तर पर कपास उत्पादन की आवश्यकता है। भूमि जलस्तर में कमी, कपास मूल्य में वृद्धि बेहतर फसल-सुरक्षा उत्पादन तकनीक, कपास-गेहूँ फसल चक्र हेतु अल्प अवधि की अधिक उपज देने वाली प्रजातियों का विकास, बिनौले को तेल व खली की व्यापक उपयोग, भारत सरकार द्वारा ‘काटन टेक्नालाजिकल मिशन’ की स्थापना आदि कपास की खेती हेतु अनुकूल परिस्थितियां है। प्रदेश में कपास की औसत उपज 2 कुन्तल/हे० है। जो सभी कपास उत्पादक राज्यों से अत्यन्त कम है। अलाभकारी होने के कारण कृषक कपास की खेती के प्रति आकर्षित नहीं होते। आधुनिक निम्न फसल उत्पादन एवं फसल सुरक्षा तकनीक अपनाकर 15 कु०/हे० तक औसत उपज प्राप्त की जा सकती है तथा 15-12 ह जार रू०/हे० तक का शुद्ध लाभ कपास से प्राप्त किया जा सकता है।

5. तिलहन

जायद में तिलहन की खेती: तिलहनी फसलों के उत्पादन एंव उत्पादकता में वृद्धि हेतु भारत सरकार द्वारा 12वीं. पंचवर्षीय योजना के अवशेष कार्यकाल (वर्ष 2015-16 से 2016-17 तक) में नेशनल मिशन आँन आँयल सीड्स एण्ड आयॅल पॉम (N.M.O.O.P.) योजना क्रियान्वित की जा रही है, जो कि 60 प्रतिशत केन्दांश एंव 40 प्रतिशत राज्याशं से वित्त पोषित है।

योजनान्तर्गत तिलहनी फसलों हेतु सिंचाई सुविधाओं के विकास मद में अनुदान पर वितरित किये जाने वाले स्प्रिंकलर इरीगेशन सिस्टम एंव एच0डी0पी0ई0 पाइप पर भारत सरकार द्वारा कम अनुदान अनुमन्य किया है, जिसके कारण प्रदेश के कृषक जो कि प्रायः साधनहीन है, उनके द्वारा भारी मात्रा में कृषक अंश वहन कर उक्त सिंचाई तकनीक का प्रयोग करना सम्भव नही हो पा रहा है, फलस्वरुप प्रदेश में तिलहनी फसलों की उत्पादन एंव उत्पादकता प्रभावित होती है।

प्रदेश के कृषकों को उक्त मदों पर राज्य आयोजनागत से अतिरिक्त अनुदान उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे तिलहनी फसलों की उत्पादकता में वृद्धि होगी एंव प्रदेश में खाद्यान्न तेलों में आत्मनिर्भरता होगी।

6. खरबूजा

खरबूजा
ख़रबूज़ा एक फल है। यह पकने पर हरे से पीले रंग के हो जाते है, हलांकि यह कई रंगों मे उपलब्ध है। मूल रूप से इसके फल लम्बी लताओं में लगते हैं। कद्दूवर्गीय फसलों में खरबूजा एक महत्वपूर्ण फसल है। खरबूजे की खेती मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार और मध्य प्रदेश के गर्म तथा शुष्क क्षेत्रों में की जाती है। हमारे देश के उत्तर-पश्चिम में खरबूजे की खेती व्यापक रूप से की जाती है। इसकी खेती नदियों के किनारे मुख्य रूप से होती है। खरबूजा एक स्वादिष्ट फल है, जो गर्मियों में तरावट देता है और इसके बीजों का उपयोग मिठाई को सजाने में किया जाता है।

7. तरबूज

तरबूज
तरबूज़ ग्रीष्म ऋतु का फल है। यह बाहर से हरे रंग के होते हैं, परन्तु अंदर से लाल और पानी से भरपूर व मीठे होते हैं। इनकी फ़सल आमतौर पर गर्मी में तैयार होती है। पारमरिक रूप से इन्हें गर्मी में खाना अच्छा माना जाता है क्योंकि यह शरीर में पानी की कमी को पूरा करते हैं। कुछ स्रोतों के अनुसार तरबूज़ रक्तचाप को संतुलित रखता है और कई बीमारियाँ दूर करता है। हिन्दी की उपभाषाओं में इसे मतीरा (राजस्थान के कुछ भागों में) और हदवाना (हरियाणा के कुछ भागों में) भी कहा जाता है।

8. ककड़ी

ककड़ी की उत्पत्ति भारत से हुई। इसकी खेती की रीति बिलकुल तरोई के समान है, केवल उसके बोने के समय में अंतर है। यदि भूमि पूर्वी जिलों में हो, जहाँ शीत ऋतु अधिक कड़ी नहीं होती, तो अक्टूबर के मध्य में बीज बोए जा सकते हैं, नहीं तो इसे जनवरी में बोना चाहिए। ऐसे स्थानों में जहाँ सर्दी अधिक पड़ती हैं, इसे फरवरी और मार्च के महीनों में लगाना चाहिए। इसकी फसल बलुई दुमट भूमियों से अच्छी होती है। इस फसल की सिंचाई सप्ताह में दो बार करनी चाहिए। ककड़ी में सबसे अच्छी सुगंध गरम शुष्क जलवायु में आती है। इसमें दो मुख्य जातियाँ होती हैं - एक में हलके हरे रंग के फल होते हैं तथा दूसरी में गहरे हरे रंग के। इनमें पहली को ही लोग पसंद करते हैं। ग्राहकों की पसंद के अनुसार फलों की चुनाई तरुणावस्था में अथवा इसके बाद करनी चाहिए। इसकी माध्य उपज लगभग ७५ मन प्रति एकड़ है।

9. करेला

करेला हमारे देश के लगभग सभी प्रदेशों में एक लोकप्रिय सब्जी है। इसके फलों का उपयोग रसेदार, भरवाँ या तले हुए शाक के रूप में होता है। कुछ लोग इसे सुखाकर भी संरक्षित करते हैं। यह खीरा वर्गीय फसलों की एक मुख्य फसल है। करेला केवल सब्जी ही नहीं बल्कि गुणकारी औषधि भी है। इसके कडवे पदार्थ द्वारा पेट में उत्पन्न हुए सूत्रकृमि तथा अन्य प्रकार के कृमियों को खत्म किया जा सकता है। करेले का उपयोग अनेक दवाइयों में भी होता है। गठिया रोग के लिए यह एक अत्यंत गुणकारी औषधि है। इसको टॉनिक के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। अनेक रोग जैसे मधुमेह आदि के उपचार के लिये यह एक रामबाण है।

10. मूंग

भारत में मूंग ग्रीष्म और खरीफ दोनों मौषम की कम समय में पकने वाली अक मुख्य दलहनी फसल है। मूंग का उपयोग मुख्य रूप से आहार में किया जाता है, जिसमें 24 से 26 प्रतिशत प्रोटीन, 55 से 60 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट और 1.3 प्रतिशत वसा होती है। यह दलहनी फसल होने के कारण इसके तने में नाइट्रोजन की गाठें पाई जाती है। जिसे इस फसल के खेत को 35 से 40 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है। ग्रीष्म मूंग की खेती चना, मटर, गेहूं, सरसों, आलू, जौ, अलसी आदि फसलों की कटाई के बाद खाली हुए खेतों में की जा सकती है।

11. लोबीया

लोबिया प्रोटीन युक्त पौष्टिक हरा चारा है। इसमें 17-18 प्रतिशत प्रोटीन पाई जाती है। लोबिया की खेती दाल, सब्जी, हरी खाद और चारे के लिए पुरे भारत में की जाती है। यह अफ्रीकी मूल की फसल है। लोबिया की खेती सूखे को सहने और जल्दी पकने वाली फसल है। यह मिट्टी में नमी बनाए रखने में मदद करती है। लोबिया प्रोटीन, कैल्शियम और लोहे का मुख्य स्त्रोत है। भारत में मुख्य रूप से कर्नाटक, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, केरल, राजस्थान और उत्तर प्रदेश इसके मुख्य उत्पादक राज्य है।

लोबिया के बहुआयामी उपयोग है। जैसे खाद्य, चारा, हरी खाद और सब्जी के रूप में होता है। लोबिया का दाना मानव आहार का पेाष्टिक घटक है तथा पशुधन चारे का सस्ता स्रोत भी है। इसके दाने में 22 से 24 प्रोटीन, 55 से 66 कार्बोहाईड्रेट, 0. 08 से 0.11 कैल्शियम और 0.005 आयरन होता है। इसमे आवश्यक एमिनो एसिड जैसे लाइसिन, लियूसिन, फेनिलएलनिन भी पाया जाता है।

12. पत्तेदार सब्जियां

जायद में शाक भाजी उत्पाद: हरी पत्तेदार सब्जियाँ हमारे स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त ही महत्वपूर्ण हैं । ये खनिज पदार्थों तथा विटामिन ’ए’, विटामिन बी.-2, विटामिन ’के.’ एवं विटामिन ’सी.’ की प्रमुख स्त्रोत हैं । लोहा, कैल्शियम, फास्फोरस व रेशा प्रचुर मात्रा में विद्यमान होने के कारण बच्चे बूढ़े यहाँ तक कि गर्भवती महिलाओं के लिए पत्तीदार सब्जियाँ अधिक उपयोगी हैं । इसके सेवन से कब्ज, अपच व आंत का कैंसर होने की संभावना कम हो जाती है ।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद् ने प्रत्येक व्यक्ति को 300 ग्राम सब्जियाँ खाने की सलाह दी जाती है जिसमें प्रति दिन 116 ग्राम पत्तीदार सब्जियों का होना आवश्यक है । पालक, मेथी और चैलाई मुख्य हरे पत्ते वाली सब्जियां हैं । ये सब्जियां स्वास्थ्यवर्धक होने के साथ कम मूल्य में आसानी से सर्वत्र उपलब्ध हो जाती हैं तथा भोजन को सरस, शीघ्र पाचनयुक्त, स्वादिष्ट, संतुलित व पौष्टिक बनाने में मदद करती हैं ।

13. मूंग

मूंग जायद की प्रमुख फसल है। दलहनी फसलों मे मूंग की बहुमुखी भूमिका है। इससे पौष्टिक तत्व प्रोटीन प्राप्त होने के अलावा फली तोड़ने के बाद फसलों को भूमि में पलट देने से यह हरी खाद की पूर्ति भी करती है। प्रदेश के एटा अलीगढ़, देवरिया, इटावा, फर्रूखाबाद, मथुरा, ललितपुर, कानपुर देहात, हरदोई एवं गाजीपुर जनपद प्रमुख मूंग उत्पादन के रूप में उभरे है। अन्य जनपदों में भी इसकी संभावनायें है।

मूंग की खेती के लिए दोमट भूमि उपयुक्त रहती है। पलेवा करके दो जुताइयां करने से खेत तैयार हो जाता है। यदि नमी की कमी हो तो दोबारा पलेवा करके बुवाई की जाए। ट्रैक्टर, पावर टिलर रोटोवेटर या अन्य आधुनिक कृषि यंत्र से खेत की तैयारी शीघ्रता से की जा सकती है। मूंग की बुवाई के लिए उपयुक्त समय 10 मार्च से 10 अप्रैल तक है। बुवाई में देर करने से फल एवं फलिया गर्म हवा के कारण तथा वर्षा होने से क्षति हो सकती है। 20-25 कि०ग्रा० स्वस्थ बीज प्रति हेक्टर पर्याप्त होता है।

14. उर्द

उर्द प्रदेश की एक मुख्य दलहनी फसल है। इसकी खेती मुख्य रूप से खरीफ में की जाती है लेकिन जायद में समय से बुवाई सघन पद्धतियों को अपनाकर करने से अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है। उर्द का पौधा जायद में कम बढ़ता है अतः 25-30 किग्रा० बीज प्रति हे० बुवाई हेतु प्रयोग करें। उर्द की बुवाई कूंडो में करना चाहियें। कूंड से कूंड की दूरी 20-25 सेमी. कूंड रखना चाहिये। बुवाई के तुंरन्त बाद पाटा लगा देना चाहियें। बुवाई का उपयुक्त समय 15 फरवरी से 15 मार्च।

15. सूरजमुखी

सूरजमुखी की खेती खरीफ ,रबी एवं जायद तीनो ही मौसमों में की जा सकती है। परन्तु खरीफ में सूरजमुखी पर अनेक रोग कीटों का प्रकोप होता है। फूल छोटे होते है। तथा उनमें दाना भी कम पड़ता है। जायद में सूरजमुखी की अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है।

जायद में सूरजमुखी की बुवाई का उपयुक्त समय फरवरी का दूसरा पखवारा है जिससे फसल मई के अन्त या जून के प्रथम सप्ताह तक पक जायें। बुवाई में देर करने से वर्ष शुरू हो जाने के बाद फूलों को नुकसान पहुंचता है। बुवाई कतारों मे ंहल के पीछे 4-5 से0मी0 की गहराई पर करनी चाहियें। लाइन से लाइन की दूरी 45 से0मी0 होनी चाहियें। और बुवाई के 15-20 दिन बाद सिंचाई से पूर्व थिनिंग (विरलीकरण) द्वारा पौधे से पौधे की आपसी दूरी 15 से0मी0 कर देनी चाहियें। 10 मार्च तक बुवाई अवश्य पूरी करा लें।

एक हेक्टेयर क्षेत्रफल के लिए 12 से 15 किग्रा० स्वस्थ संकुल प्रजाति का प्रमाणित बीज पर्याप्त होता है, जब कि संकर प्रजाति का 5-6 किग्रा. बीज प्रति हे. उपयुक्त रहता है। यदि बीज का जमाव 70 प्रतिशत से कम हो तो तद्नुसार बीज की मात्रा बढ़ा देना चाहिये।

16. मूंगफली

उत्तर प्रदेश में ग्रीष्मकालीन मूँगफली की खेती का प्रचार–प्रसार जनपद फर्रूखाबाद मैनपुरी हरदोई, अलीगढ़ आदि जिलों में बढ़ा है क्योंकि खरीफ की अपेक्षा जायद में कीड़े आदि बीमारियों का प्रकोप कम होता है।

बीज का चयन रोग रहित उगायी गयी फसल से करें। ग्रीष्मकालीन फसल से अच्छी पैदावार होने हेतु (गिरी) में 95-100 किलोग्राम बीज प्रति हैक्टेयर की दर से डालना चाहिए। बीज की मात्रा कम न करें अन्यथा पौधे कम रहने पर उपज सीधे प्रभावित होगी।

ग्रीष्मकालीन मूँगफली की अच्छी उपज लेने के लिए अच्छा होगा कि बुवाई मार्च के प्रथम सप्ताह में अवश्य समाप्त कर लें। विलम्ब से बुवाई करने पर मानसून की वर्ष प्रारम्भ होने की दशा में खुदाई के बाद फलियों की सुखाई करने में कठिनाई होगी।

17. मक्का

जायद में मक्का की खेती भुट्टो एंव चारे दोनो के लिए की जाती है। मक्का की बुवाई के लिए फरवरी का प्रथम सप्ताह सर्वोत्तम है। बुवाई 20 फरवरी तक अवश्य कर लेना चाहिए। विलम्ब करने से जीरा निकलते समय गर्म हवायें चलने पर सिल्क तथा पराग कणों के सूखने की सम्भावना रहती है जिससे दाना नहीं पड़ता है। 20-25 किग्रा. संकुल एवं 18-20 किग्रा. संकर बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है। बीज को 2.5 ग्राम थीरम या 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम रसायन से प्रति किलो बीज को शोधित करके बोयें।

18. चना (जेठी)

प्रदेश में छोटे एवं मोटे अनाजों में चेना (जेठी सांवा) की खेती केवल जायद में ही होती है। इसे हम जायद सांवा के रूप में भी जानते हैं। इसकी खेती साधारणतया आलू, सरसों, राई एवं गन्ना की फसल कटने के बाद की जाती है। यह फसल 65-70 दिन में पककर तैयार हो जाती है तथा उन्नतिशील विधि से खेती करने पर अच्छी पैदावार देने की क्षमता रखती है।

5-8 किग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर बुवाई के लिए पर्याप्त है। चूंकि बीज का छिलका कड़ा होता है इसलिए बोने से पूर्व बीज को रात में पानी में भिगोकर तथा छाये में सुखाकर बोना चाहिए, जिससे बीज का जमाव अच्छा हो सके। बोने का उपयुक्त समय 15 फरवरी से 15 मार्च तक पाया गया है। 15 मार्च के बाद फसल बोने पर अधिक पानी की आवश्यकता पड़ती है तथा तापक्रम बढ़ जाने के कारण उपज भी प्रभावित होती है।

19. हरा चारा

जायद में पशुओं के लिए हरे चारे की बहुत कमी रहती है जिसका दुधारू पशुओं के स्वास्थ्य एवं दूध उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इस समस्या के समाधान हेतु जायद में बहु कटाई वाली ज्वार, लोबिया, मक्का तथा बाजरा आदि फसलों को चारे के लिए अवश्य बोना चाहिए।

इसकी बुवाई मार्च के दि्वतीय सप्ताह से मार्च तक करना चाहिए। 30-40 किग्रा. प्रति हेक्टेयर। प्रायः इसे छिटकवां बोते हैं। हल के पीछे 25-30 सेमी. की दूरी पर लाइनों में इसकी बुवाई करना अच्छा होता है। उर्वरकों का प्रयोग भूमि परीक्षण के आधार पर करें। 30 किग्रा. नत्रजन तथा 30 किग्रा. फास्फोरस बुवाई के समय प्रयोग करें। एक माह बाद 30 किग्रा. नत्रजन खड़ी फसल में दें। प्रत्यके कटान के बाद सिंचाई के उपरान्त ही 30 किग्रा. नत्रजन का दुबारा प्रयोग करें।

बोने के तुरन्त बाद 1 किग्रा. एट्राजीन 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें। वरू घास की समस्या का निदान पाने हेतु फसल चक्र अपनाया जायें। फसल को वर्षा होने से पूर्व हर 8 से 12 दिन बाद सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। बवाई के 50-60 दिन बाद हरे चारे के लिए पहली कटाई करना चाहिए। इसके बाद फसल हर 25-30 दिन बाद काटने योग्य हो जाती है। मार्च में बोई गयी ज्वार से सितम्बर के अन्त तक 4 कटाइयां ली जा सकती हैं। हरे चारे की उपज प्रति कटाई में 200-250 कु. प्रति हेक्टेयर प्राप्त हो सकती है।

20. मेन्था की खेती

मेंथा की खेती बदायूं, रामपुर, मुरादाबाद, बरेली, पीलीभीत, बाराबंकी, फैजाबाद, अम्बेडकर नगर, लखनऊ आदि जिलों में किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर की जाती है। विगत कुछ वर्षों से मेंथा इन जिलों में जायद की प्रमुख फसल के रूप में अपना स्थान बना रही है। इसके तेल का उपयोग सुगन्ध के लिए व औषधि बनाने में किया जाता है। मेन्था की जड़ों की बुवाई अगस्त माह में नर्सरी में कर देते हैं। नर्सरी को ऊँचे स्थान में बनाते है ताकि इसे जलभराव से रोका जा सके। अधिक वर्षा हो जाने पर जल का निकास करना चाहिए।

समय से मेन्था की जड़ों की बुवाई का उचति समय 15 जनवरी से 15 फरवरी है। देर से बुवाई करने पर तेल की मात्रा कम हो जाती है व कम उपज मिलती है। देर बुवाई हेतु पौधों को नर्सरी में तैयार करके मार्च से अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक खेत में पौधों की रोपाई अवश्य कर देना चाहिए। विलम्ब से मेंथा की खेती के लिए कोसी प्रजाति का चुनाव करें।

21. जायद में गन्ने की खेती

गन्ने की उत्पादकता एवं चीनी परता में अभिवृद्धि को दृष्टिगत रखते हुए यह अत्यन्त आवश्यक है कि इस प्रकार की आधुनिक तकनीकी पर आधारित गन्ने की खेती की जाये, जिससे गन्ने का उत्पादन बढ़े साथ ही साथ उसके प्रसंस्करण के उपरान्त अधिकाधिक चीनी प्राप्त हो। साथ ही यह भी प्रयास होना चाहिए कि गन्ना उत्पादन लागत में अत्याधिक वृद्धि न होने पाये।

गन्ने की खेती के लिए सामान्यतः 10-15 प्रतिशत नमी युक्त दोमट भूमि उपयुक्त रहती है। उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में 30-35 डि०से० का तापक्रम वर्ष में दो बार अक्टूबर एवं फरवरी-मार्च में आता है। जो गन्ने की बुवाई के लिए उपयुक्त समय के साथ के साथ ही सर्वोत्तम जमाव हेतु भी उपयुक्त है। सामान्यतयः पंक्ति से पंक्ति के मध्य 90 सेमी० दूरी रखने एवं तीन ऑख वाले टुकड़े बोने पर लगभग 37.5 हजार टुकड़े अथवा गन्ने की मोटाई के अनुसार 60-65 कुन्तल बीज गन्ना प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग किया जाता है।

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